पाली क्षैत्र के समाचार & अपडेट्स

ई-विशेषांक

​Congress ने AI Video जारी कर Galwan Clash में ‘हार’ की कहानी गढ़ी, आखिर संदेह के बीज क्यों बोए जा रहे हैं? 

जब भी कांग्रेस पार्टी को ठोस मुद्दों पर जनता का भरोसा जीतना कठिन लगता है, तब-तब वह सेना और सीमा के सवालों को राजनीतिक रंग देकर माहौल गरमाने का प्रयास करती है। कांग्रेस पार्टी के नेता खासकर राहुल गांधी कभी किसी बयान को तोड़ मरोड़ कर, कभी किसी अधूरी जानकारी को उछाल कर और अब एआई वीडियो के जरिये यह झूठा आख्यान गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत चीन संघर्ष के दौरान मोदी सरकार पीछे हट गयी थी। कांग्रेस पार्टी के एआई वीडियो में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपमानजनक बातें तक कही गयी हैं।कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर जारी वीडियो में यह दिखाने की कोशिश की गयी है कि चीनी हमले के समय भारत की सरकार ने सेना को स्पष्ट आदेश नहीं दिये और जवानों को उनके हाल पर छोड़ दिया था। यह कथन न केवल वास्तविकता से परे है बल्कि उन वीर जवानों के बलिदान का भी अपमान है जिन्होंने कठिन से कठिन परिस्थिति में डटे रहकर देश की रक्षा की। पूरा देश जानता है कि गलवान घाटी में हमारे सैनिकों ने किस साहस से दुश्मनों का सामना किया था। बर्फीली रात, शून्य से नीचे तापमान, तेज बहती नदी और आमने सामने की झड़प, इन सबके बीच भारतीय सैनिकों ने अदम्य धैर्य और शौर्य दिखाया था। उस समय कोरोना काल में तमाम दुश्वारियों के बावजूद भारत की सरकार ने सेना को किसी भी रूप में संसाधनों की कमी नहीं होने दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं सेना के जवानों के शौर्य की सराहना करने के लिए लद्दाख गये थे।इसे भी पढ़ें: BJP का Rahul Gandhi पर अब तक का सबसे बड़ा हमला, कहा- ‘एक झूठा बन गया है LoP’कांग्रेस पार्टी अपने एआई वीडियो में भले भारत की हार का ऐलान कर रही हो लेकिन उसको पता होना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनेक जानकारों ने माना था कि उस संघर्ष में चीन को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। एक विस्तृत जांच पर आधारित ऑस्ट्रेलियाई समाचार पत्र क्लैक्सन की खोज ने यह निष्कर्ष निकाला था कि चीन ने अपने सैनिकों की हानि को बहुत कम करके बताया था। ऑस्ट्रेलियाई रिपोर्ट के अनुसार जून 2020 की उस रात चीन के 42 तक सैनिक मारे गये हो सकते हैं, जो उसके आधिकारिक दावे से कई गुना अधिक हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया था कि जिन चार सैनिकों की मृत्यु चीन ने मानी, उनमें से केवल एक के डूबने की बात कही गयी, जबकि सोशल मीडिया मंचों पर अनेक यूजर्स ने लिखा कि उससे कहीं अधिक चीनी सैनिक बह गये थे। रिपोर्टों में सामने आया था कि चीन के मृत सैनिकों के शव पहले सीमा के पास एक शहीद स्मारक स्थल पर ले जाये गये थे और फिर उनके गृह नगरों में श्रद्धांजलि समारोह हुए थे। रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई थी कि चीन ने इस संघर्ष पर चर्चा दबाने के लिए कड़े कदम उठाये और वास्तविक हानि को सार्वजनिक होने से रोका था। इन खुलासों से यह स्पष्ट होता है कि गलवान में भारत के जवानों ने जितना साहस दिखाया था उसका असर सामने वाली सेना पर बड़े गहरे रूप से पड़ा था। यही नहीं, रूसी समाचार एजेंसी तास के प्रतिवेदन ने भी गलवान घाटी के संघर्ष में चीन को हुए भारी नुकसान की ओर साफ संकेत दिया था। तास ने लिखा था कि जून 2020 की भिड़ंत में कम से कम बीस भारतीय और पैंतालीस चीनी सैनिक मारे गये थे। हम आपको यह भी बता दें कि चीनी सोशल मीडिया पर वायरल हुई 19 वर्ष के सैनिक की समाधि की तस्वीर भी गलवान की उस रात चीन को हुए नुकसान की ओर इशारा करती है। इस समाधि लेख में साफ लिखा था कि वह सैनिक जून 2020 में हुई लड़ाई में मारा गया। ऐसी ही कई अन्य तस्वीरें भी उस समय सामने आई थी। माना गया कि चीनी सेना के भीतर असंतोष के कारण ही ऐसे खुलासे बाहर आये थे। उल्लेखनीय है कि उस समय भारत ने अपने 20 वीर सैनिकों के शहीद होने की आधिकारिक घोषणा की थी।दूसरी ओर, अब सवाल यह उठता है कि एक गंभीर और जटिल प्रसंग को कांग्रेस पार्टी की ओर से राजनीतिक हथियार बना देना क्या उचित है? यदि कोई दल एआई से बना वीडियो चलाकर यह कथा गढ़े कि सरकार ने सेना को बेसहारा छोड़ दिया तो यह केवल सरकार पर प्रहार नहीं है, यह सेना के मनोबल पर भी चोट है। सैनिक जब सीमा पर खड़ा होता है तो उसे भरोसा होता है कि देश, सरकार और जनता उसके साथ है। यदि भीतर से ही संदेह के बीज बोये जायेंगे तो उसका असर दूर तक जाता है।लोकतंत्र में प्रश्न पूछना विपक्ष का अधिकार है, पर प्रश्न और प्रपंच में अंतर होता है। तथ्य आधारित आलोचना और मनगढ़ंत दृश्य रचकर जनमत भटकाने में जमीन आसमान का फर्क है। गलवान का संघर्ष चार दशकों में सबसे घातक टकराव था। इसके बाद चार साल तक कई मोर्चों पर आमने सामने तैनाती रही। ऐसे समय में जरूरत है राष्ट्रीय एकता की, न कि ऐसे आख्यानों की जो विरोध के नाम पर देश की छवि और सेना के सम्मान को आहत करें। राजनीतिक लाभ के लिए सेना के बलिदान को विवाद में घसीटना खतरनाक परंपरा है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, पर असत्य का सहारा लेकर असहमति जताना लोकतंत्र को कमजोर करता है।देश की जनता समझदार है। वह जानती है कि सीमा पर खड़ा जवान किसके लिए लड़ता है। वह यह भी देखती है कि कौन उसके शौर्य का सम्मान करता है और कौन उसे अपने राजनीतिक कथानक का साधन बनाता है। समय आ गया है कि राजनीति का स्तर इतना ऊंचा रखा जाये कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सैनिकों के सम्मान पर कोई आंच न आये। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, यही जिम्मेदार लोकतंत्र की पहचान है। 

See More results...

Generic selectors
Exact matches only
Search in title
Search in content
Post Type Selectors
Enable Notifications OK NO