जम्मू-कश्मीर में बिजली उत्पादन को बढ़ाने के लिए उमर अब्दुल्ला सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। पहलगाम में अप्रैल 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद बदले हालात और सिंधु जल संधि के स्थगन के बीच अब राज्य सरकार ने 120 साल पुरानी मोहरा जल विद्युत परियोजना को फिर से शुरू करने की तैयारी कर ली है। लंबे समय से बंद पड़ी इस ऐतिहासिक परियोजना का पुनर्जीवन न सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती देगा, बल्कि कश्मीर की विरासत को भी नई पहचान दिलाएगा।हम आपको बता दें कि राज्य में ऊर्जा विभाग की भी जिम्मेदारी संभाल रहे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में जानकारी दी है कि जम्मू कश्मीर राज्य विद्युत विकास निगम के निदेशक मंडल ने इस परियोजना के पुनरुद्धार की प्रक्रिया शुरू कर दी है। नौ फरवरी को हुई बैठक में इस परियोजना के नवीनीकरण, आधुनिकीकरण, उन्नयन, संचालन और रखरखाव के लिए एक सलाहकार नियुक्त करने हेतु सीमित निविदा प्रक्रिया को मंजूरी दी गई। यह कदम इस परियोजना को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और इसकी उपयोगिता को पुनर्स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।इसे भी पढ़ें: जम्मू-कश्मीर: सरकारी विभागों पर 3,747 करोड़ का बिजली बिल बकाया, CM उमर अब्दुल्ला ने पेश किए चौंकाने वाले आंकड़ेहम आपको बता दें कि मोहरा विद्युत परियोजना उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले के उरी क्षेत्र के बोनियार में झेलम नदी के किनारे स्थित है। इस परियोजना की स्थापना वर्ष 1905 में की गई थी और यह देश की सबसे पुरानी जल विद्युत परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। प्रारंभ में इसकी क्षमता लगभग पांच मेगावाट थी और इसे नदी के बहाव पर आधारित प्रणाली के रूप में तैयार किया गया था।हालांकि सितंबर 1992 में आई भीषण बाढ़ के कारण इस परियोजना को भारी नुकसान पहुंचा। विशेष रूप से इसकी जल निकासी प्रणाली प्रभावित हुई, जिससे विद्युत उत्पादन घटकर लगभग तीन मेगावाट रह गया और अंततः इसे बंद करना पड़ा। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना तकनीकी दृष्टि से अपने समय की एक अद्भुत उपलब्धि थी।इस परियोजना की एक खास विशेषता इसका लकड़ी का जल मार्ग है, जो पहाड़ियों के साथ साथ दस किलोमीटर से अधिक लंबाई में फैला हुआ है। इस माध्यम से रामपुर से मोहरा तक पानी पहुंचाया जाता था, जिससे टरबाइन चलती थीं। यह उस दौर की पर्यावरण के अनुकूल और कम प्रभाव वाली अभियांत्रिकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसके टरबाइन चेकोस्लोवाकिया से मंगाए गए थे, जो उस समय की उन्नत तकनीक को दर्शाते हैं।दिलचस्प बात यह है कि करीब नौ वर्ष पहले इस परियोजना को एक विरासत स्थल के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव भी सामने आया था, लेकिन वह आगे नहीं बढ़ सका। अब इसके पुनर्जीवन की योजना न केवल ऊर्जा उत्पादन बल्कि ऐतिहासिक महत्व को भी ध्यान में रखते हुए तैयार की जा रही है।मुख्यमंत्री द्वारा हाल ही में विधानसभा में यह भी बताया गया कि जम्मू-कश्मीर में चल रही जल विद्युत परियोजनाओं की गति तेज की जा रही है। इसका उद्देश्य वर्ष 2035 तक वर्तमान लगभग 3540 मेगावाट उत्पादन क्षमता को बढ़ाकर करीब 11000 मेगावाट तक पहुंचाना है। ऐसे में मोहरा परियोजना का पुनर्जीवन एक व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसका लक्ष्य ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना है।विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही इस परियोजना की प्रस्तावित क्षमता लगभग 10.5 मेगावाट है और यह क्षेत्र की बिजली कमी को पूरी तरह दूर नहीं कर पाएगी, लेकिन इसका प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत बड़ा है। यह परियोजना कश्मीर के तकनीकी इतिहास और विरासत का एक जीवंत उदाहरण है, जिसे संरक्षित और पुनर्जीवित करना आवश्यक है।देखा जाये तो मोहरा विद्युत परियोजना का पुनरुद्धार न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, बल्कि यह क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर को भी नई पहचान देने का प्रयास है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस परियोजना को किस प्रकार आधुनिक तकनीक और विरासत संरक्षण के संतुलन के साथ आगे बढ़ाती है।
