प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले महीने नॉर्वे में आयोजित भारत नॉर्डिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए यूरोप यात्रा पर जा रहे हैं और इसी दौरान उनके संयुक्त अरब अमीरात में एक संक्षिप्त लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण ठहराव की संभावना जताई जा रही है। यह प्रस्तावित ठहराव पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका ईरान संघर्षविराम के बीच भारत की सक्रिय कूटनीतिक भूमिका का संकेत है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री की यूएई यात्रा अभी अंतिम रूप में तय नहीं हुई है, लेकिन इस पर गंभीर स्तर पर चर्चा चल रही है। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल भी यूएई का दौरा करके आये हैं और माना जा रहा है कि उन्होंने वहां प्रधानमंत्री की संक्षिप्त यात्रा कार्यक्रम को अंतिम रूप दे दिया है जिसकी घोषणा जल्द ही कर दी जायेगी।हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा नॉर्वे के ओस्लो में होने वाले भारत नॉर्डिक सम्मेलन से शुरू होगा, जिसके बाद उनका कार्यक्रम नीदरलैंड, स्वीडन और इटली जाने का है। यदि यूएई में उनका ठहराव तय होता है, तो यह खाड़ी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक साझेदारी को और सुदृढ़ करेगा। देखा जाये तो इस संभावित यात्रा का समय अत्यंत संवेदनशील है। अमेरिका और ईरान के बीच नाजुक संघर्षविराम चल रहा है, जो किसी भी समय प्रभावित हो सकता है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सक्रियता क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकती है। प्रधानमंत्री पहले ही यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नहयान से बातचीत कर क्षेत्रीय संप्रभुता के उल्लंघन की निंदा कर चुके हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना इस यात्रा का प्रमुख लक्ष्य माना जा रहा है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा है।इसे भी पढ़ें: China, Bangladesh, Nepal, Sri Lanka के साथ सहयोग बढ़ाकर मोदी ने बदल डाले South Asia के समीकरणऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह दौरा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति मार्ग प्रभावित हो रहे हैं, ऐसे में भारत वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। यूएई के साथ हाल में हुए गैस समझौते और आर्थिक गलियारे पर संभावित चर्चा इस दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है। प्रवासी भारतीयों की चिंता भी इस यात्रा के केंद्र में है। खाड़ी देशों में बसे लाखों भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की प्राथमिकता है। इसके साथ ही भारत और यूएई के बीच रक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति संभव है।दूसरी ओर, भारत नॉर्डिक सम्मेलन इस पूरे दौरे का प्रमुख केंद्र है। यह एक अनूठा मंच है जहां भारत नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड के नेताओं के साथ सामूहिक संवाद करता है। यह सम्मेलन पहले 2018 में स्टॉकहोम और 2022 में कोपेनहेगन में आयोजित हो चुका है, जबकि तीसरा सम्मेलन मई 2026 में ओस्लो में प्रस्तावित है। इस सम्मेलन का दायरा अत्यंत व्यापक है। इसमें हरित प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, डिजिटल नवाचार, समुद्री अर्थव्यवस्था और वैश्विक सुरक्षा जैसे विषय शामिल हैं। हम आपको बता दें कि नॉर्डिक देश स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी नवाचार में अग्रणी हैं और भारत के साथ उनका सहयोग वैश्विक विकास के नए मानक तय कर सकता है।भारत और नॉर्डिक देशों के संबंध रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह साझेदारी तकनीकी विशेषज्ञता और आर्थिक विस्तार का अद्भुत संगम है। हरित ऊर्जा, ब्लू अर्थव्यवस्था और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों पक्षों का सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। आर्कटिक क्षेत्र में संयुक्त अनुसंधान और जलवायु अध्ययन भी इस साझेदारी को नई गहराई प्रदान करते हैं। हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी की नॉर्डिक नीति नवाचार और स्थिरता पर आधारित है। यह नीति पारंपरिक व्यापार से आगे बढ़कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत संचार तकनीक और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित है। साथ ही निवेश को आकर्षित करने के लिए आर्थिक समझौतों को भी गति दी जा रही है।यदि इस सम्मेलन के वैश्विक प्रभाव की बात करें तो यह केवल एक क्षेत्रीय पहल नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक प्रयोगशाला की तरह है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए यहां विकसित मॉडल अन्य देशों के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं। साथ ही भारी उद्योगों के प्रदूषण को कम करने के प्रयास वैश्विक स्तर पर नई दिशा दे सकते हैं। इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग से वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव संभव है। उत्तरी समुद्री मार्ग के विकसित होने से एशिया और यूरोप के बीच दूरी और समय दोनों कम हो सकते हैं। इसके साथ ही डिजिटल और तकनीकी सहयोग वैश्विक शक्ति संतुलन को नया रूप दे सकता है।समग्र रूप से देखा जाये तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा एक व्यापक रणनीतिक पहल है। यह पश्चिम एशिया में स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा को मजबूत करती है, वहीं नॉर्डिक देशों के साथ सहयोग के माध्यम से भारत को वैश्विक नवाचार और स्थिर विकास का केंद्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ाती है। यह यात्रा भारत की उभरती वैश्विक भूमिका को और अधिक सशक्त बनाने का संकेत देती है।
