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​नौसेना को मिली डबल शक्ति: Nuclear Submarine INS अरिधमन और INS तारागिरी से बढ़ी भारत की समुद्री ताकत 

भारत की समुद्री ताकत को बड़ा मजबूती देने वाली एक अहम उपलब्धि सामने आई है, जहां देश की तीसरी स्वदेशी परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी आईएनएस अरिधमन को नौसेना में शामिल कर लिया गया है। इस उपलब्धि को तकनीकी और सैन्य दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।बता दें कि आईएनएस अरिधमन अरिहंत श्रेणी की पनडुब्बी है और इसे बड़े स्तर पर स्वदेशी तकनीक से तैयार किया गया है। मौजूद जानकारी के अनुसार, करीब 90 प्रतिशत हिस्सों में देश में विकसित तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।यह पनडुब्बी परमाणु रिएक्टर से संचालित होती है, जिससे इसे बार-बार सतह पर आने की जरूरत नहीं पड़ती और यह लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर अभियान चला सकती है। इसकी गति भी काफी तेज बताई जा रही है, जिससे यह समुद्र के भीतर तेजी से अपनी स्थिति बदल सकती है।गौरतलब है कि यह अपने पहले के संस्करणों की तुलना में ज्यादा भारी और ज्यादा सक्षम है। इसमें मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता दोगुनी कर दी गई है और इसकी मारक क्षमता भी काफी बढ़ाई गई है। यह समुद्र की गहराई से ही दुश्मन के ठिकानों पर हमला करने में सक्षम मानी जा रही है।मौजूद जानकारी के अनुसार, इसमें कई प्रकार की बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात की जा सकती हैं, जिनकी मारक क्षमता सैकड़ों से लेकर हजारों किलोमीटर तक है। भविष्य में और लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों से भी इसे लैस किया जा सकता है।गौरतलब है कि इससे पहले आईएनएस अरिहंत और आईएनएस अरिघात को भी नौसेना में शामिल किया जा चुका है। इन पनडुब्बियों के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल है जिनके पास परमाणु क्षमता से लैस पनडुब्बियां मौजूद हैं।इसी कार्यक्रम के दौरान एक और आधुनिक युद्धपोत आईएनएस तारागिरी को भी शामिल किया गया। यह युद्धपोत आधुनिक तकनीक और स्वदेशी निर्माण क्षमता का उदाहरण माना जा रहा है। बताया जा रहा है कि इसमें बड़ी संख्या में देश के छोटे और मध्यम उद्योगों का योगदान रहा है, जिससे घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिली है।यह युद्धपोत तेज गति, लंबी दूरी तक संचालन और विभिन्न प्रकार के समुद्री अभियानों के लिए तैयार किया गया है। इसमें आधुनिक हथियार प्रणालियां और उन्नत नियंत्रण प्रणाली लगाई गई है, जिससे यह किसी भी खतरे का तेजी से जवाब देने में सक्षम है।कुल मिलाकर यह दोनों शामिलियां भारत की समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही हैं और इससे देश की रक्षा तैयारियों को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। 

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